गुजरे वक़्त के वह कुछ पल ..........
गुजरे पल के वह पल जब याद आते हैं तो
अनायास ही यादें बचपन की गलियों में अठखेलियां करने लगती हैं !
खूबसूरत वक़्त था जब छोटे थे न कोई पाबन्दी न कोई रोक टॉक , न चिंता न ही कोई सोच !
दिनभर मस्ती और मौज , कभी बैल गाड़ी की सवारी तो कभी ट्रेक्टर पर घूमना
खेत खलिआनो के तो न जाने कितने ही चक्कर लगा आते थे ,
अमरुद और आम के बागों से चुपके से अमरुद और आम चुराना
और अपने आप को बचाने के लिए संगी साथियों के नाम लगाना!
वह लड़ना झगड़ना , वह रूठना मनाना !
वह झूठी शिकायते लगाकर एक दूसरे को चिड़ाना ,
वाकई गुजरे पल के वह पल जब याद आते हैं तो अनायास ही यादें बचपन की गलियों में अठखेलियां करने लगती हैं!
वह बारिश में भीगना और कॉपी के पन्नो की अनगिनत किश्तियाँ पानी में चलाना,
एक दूसरे की किश्ती को पानी में डुबाना
और फिर जोर जोर से खिलखिलाकर हँसना,
जब कोई नाराज़ होता तो दौड़ भाग कर उससे दूर निकल जाना !
सच गुजरे पल के वह पल जब याद आते हैं तो
अनायास ही यादें बचपन की गलियों में अठखेलियां करने करने लगती हैं!
वह गुड्डे गुड्डियो की शादी करना ,
घर घर खेलना और अनगिनत खुशियों को अपने दामन में समेट लेना
मिटटी के खिलौने बनाना और अपने कलाकारी को खुद ही निहारना ,
कभी मिटटीं के घरोंदा बनाना और फिर पल में ही सब समेट लेना ,
अक्सर बचपन की उस मासूमियत को शायद आज भी मन में बिठाये रखा है !
वाकई गुजरे पल के वह पल जब याद आते हैं
तो अनायास ही यादें बचपन की गलियों में अठखेलियां करने करने लगती हैं!

गुजरे पल के वह पल जब याद आते हैं तो
अनायास ही यादें बचपन की गलियों में अठखेलियां करने लगती हैं !
खूबसूरत वक़्त था जब छोटे थे न कोई पाबन्दी न कोई रोक टॉक , न चिंता न ही कोई सोच !
दिनभर मस्ती और मौज , कभी बैल गाड़ी की सवारी तो कभी ट्रेक्टर पर घूमना
खेत खलिआनो के तो न जाने कितने ही चक्कर लगा आते थे ,
अमरुद और आम के बागों से चुपके से अमरुद और आम चुराना
और अपने आप को बचाने के लिए संगी साथियों के नाम लगाना!
वह लड़ना झगड़ना , वह रूठना मनाना !
वह झूठी शिकायते लगाकर एक दूसरे को चिड़ाना ,
वाकई गुजरे पल के वह पल जब याद आते हैं तो अनायास ही यादें बचपन की गलियों में अठखेलियां करने लगती हैं!
वह बारिश में भीगना और कॉपी के पन्नो की अनगिनत किश्तियाँ पानी में चलाना,
एक दूसरे की किश्ती को पानी में डुबाना
और फिर जोर जोर से खिलखिलाकर हँसना,
जब कोई नाराज़ होता तो दौड़ भाग कर उससे दूर निकल जाना !
सच गुजरे पल के वह पल जब याद आते हैं तो
अनायास ही यादें बचपन की गलियों में अठखेलियां करने करने लगती हैं!
वह गुड्डे गुड्डियो की शादी करना ,
घर घर खेलना और अनगिनत खुशियों को अपने दामन में समेट लेना
मिटटी के खिलौने बनाना और अपने कलाकारी को खुद ही निहारना ,
कभी मिटटीं के घरोंदा बनाना और फिर पल में ही सब समेट लेना ,
अक्सर बचपन की उस मासूमियत को शायद आज भी मन में बिठाये रखा है !
वाकई गुजरे पल के वह पल जब याद आते हैं
तो अनायास ही यादें बचपन की गलियों में अठखेलियां करने करने लगती हैं!